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यशु मसीह करें खोजें By वनिता कासनियां पंजाबपरमेश्वर को जानना परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानना परमेश्वर को जानने के लिए क्या करना पड़ेगा? निम्नलिखित यह बताएगा कि आप व्यक्तिगत रूप से किस प्रकार, इसी क्षण, परमेश्वर के साथ एक रिश्ता आरम्भ कर सकते हैं। परमेश्वर के साथ रिश्ता बनाने के लिए क्या करना पड़ता है? बिजली के गिरने का इंतजार? या अपने आप को निःस्वार्थ भाव से धार्मिक कार्यों में लगा लेना? या फिर, एक बेहतर मनुष्य बनना, ताकि परमेश्वर आपको स्वीकार कर ले? नहीं, इनमें से कुछ भी नहीं! परमेश्वर ने बाइबल में यह बहुत स्पष्ट तरीक़े से बताया है कि हम उसे कैसे जान सकते हैं? यह लेख आपको बताएगा कि आप किस प्रकार, इसी क्षण, व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के साथ एक रिश्ता आरम्भ कर सकते हैं।… सिद्धान्त एक: परमेश्वर आपसे प्रेम करता है और आपके जीवन के लिए उसकी एक अद्भुत योजना है। बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम परमेश्वर ने आपको बनाया है। केवल यही नहीं, वह आपसे बहुत प्रेम करता है और चाहता है कि आप उसे अभी से जानें और उसके साथ एक अनंत जीवन बिताएँ। यीशु मसीह ने कहा, “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”1 यीशु मसीह इसलिए आए ताकि हममें से हर एक जन व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर को जान और समझ सके। केवल यीशु ही जीवन में अर्थ और उद्देश्य दे सकते हैं। तो, परमेश्वर को जानने से हमें क्या दूर रखता है?... सिद्धान्त दो: हम सब पाप करते हैं, और हमारे पापों ने ही हमें परमेश्वर से अलग किया है। हम उस अलगाव को, जो कि हमें परमेश्वर से दूर करता है, अपने पापों की वजह से महसूस करते हैं। बाइबल हमें बताती है, “हम तो सब के सब भेड़ों की तरह भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग ले लिया।”2 हमारे दिल की गहराई में, परमेश्वर और उसके तरीकों के प्रति हमारा रवैया शायद एक सक्रिय विद्रोह या फिर एक निष्क्रिय उदासीनता की तरह है। लेकिन ये सब उसी का प्रमाण है जिसे बाइबल पाप कहती है। हमारे जीवन में पाप का परिणाम मृत्यु है -- यानी के, परमेश्वर से आत्मिक अलगाव।3 हालांकि हम अपने प्रयत्न से परमेश्वर के करीब जाने की कोशिश तो करते हैं, पर हम अनिवार्य रूप से असफल होते हैं। परमेश्वर और हमारे बीच एक बहुत बड़ा फासला है। इस चित्र में तीरों के चिह्न यह दर्शाते हैं कि हम किस तरह से अपने प्रयत्नों/प्रयास से परमेश्वर तक पहुँचना चाहते हैं…दूसरों के प्रति अच्छे काम कर के, धार्मिक रसम रिवाज कर के, अच्छा मनुष्य बनने का प्रयास करके, इत्यादि। पर समस्या यह है कि हमारे हर अच्छे से अच्छे प्रयास भी हमारे पापों को छिपाने में, या उन्हें मिटाने में अपर्याप्त होते हैं। परमेश्वर हमारे पाप को जनता है, और यह पाप एक बाधा के समान उनके और हमारे बीच में खड़ा हो जाता है। और, बाइबल कहती है की पाप की सज़ा मृत्यु है जिसकी वजह से हम अनंतकाल के लिए परमेश्वर से अलग हो जाते… ...सिवाय इसके कि परमेश्वर ने हमारे लिए कुछ किया। तो, हम किस प्रकार परमेश्वर के साथ रिश्ता बना सकते हैं? ... सिद्धान्त तीन: हमारे पापों को धोने का एकमात्र तरीका जो परमेश्वर ने हमें दिया है, वह यीशु मसीह है। केवल उनके द्वारा हम परमेश्वर के प्रेम को, और हमारे जीवन के लिए जो उनकी योजना है, उसको जान और अनुभव कर सकते हैं। यीशु मसीह ने हमारे सारे पाप अपने ऊपर ले लिए--यह जानते हुए की हमने कितना पाप किया है, और कितना पाप और आगे करेंगे--और उन्होंने हमारे सारे पापों का भुगतान सलीब पर चढ़ कर, अपनी जान हमारे लिए देकर, चुका दिया। वह हमारी जगह पर मरे, और उन्होंने यह इसलिए किया, क्योंकि वह हमसे बहुत प्रेम करते हैं। “…तो उस ने हमारा उद्धार किया, और यह हमारे धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने किए, पर उसकी दया/अनुग्रह के द्वारा है।”4 “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”5 यीशु, “अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है…सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।”6 यीशु मसीह हमारे पापों के लिये केवल मरे नहीं, परंतु तीसरे दिन जी भी उठे।7 जब उन्होंने ऐसा किया, उन्होंने निःसंदेह यह सिद्ध कर दिया कि वे जायज़ रूप/पूरे हक़ से, अनंत जीवन का वादा कर सकते हैं – और कि वे ‘परमेश्वर के पुत्र’ हैं तथा परमेश्वर को जानने का एकमात्र रास्ता हैं। इसलिए यीशु ने कहा “मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।”8 परमेश्वर तक पहुँचने का कठिन प्रयास करने के बजाय, वह हमें यह बताते हैं कि हम कैसे, इसी क्षण, उनके साथ एक रिश्ता कायम कर सकते हैं। यीशु पुकार कर कहते हैं, “मेरे पास आओ।” “यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। जो मुझ पर विश्वास करेगा…उसके ह्रदय में से जीवन के जल की नदियां बह निकलेंगी।”9 यह यीशु मसीह का हमारे प्रति प्रेम ही था जिस कारण उन्होंने सूली/सलीब को सहा। और अब वह हमें अपने पास आने का निमंत्रण देते हैं, ताकि हम परमेश्वर के साथ एक व्यक्तिगत रिश्ता बना सकें। केवल यह जानना कि यीशु मसीह ने हमारे लिए क्या किया और वे हमें क्या दे रहे हैं, पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर के साथ एक रिश्ता बनाने के लिए हमें उनको अपने जीवन में स्वागत करना होगा… सिद्धान्त चार: हमें व्यक्तिगत रूप से यीशु मसीह को अपने प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना होगा। बाइबल कहती है, “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।10 हम यीशु को विश्वास के द्वारा स्वीकार करते हैं। बाइबल कहती है, “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है और न कर्मों के कारण; ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”11 उद्धार, हमारे अच्छे कर्मों का इनाम या नतीजा नहीं है, इसलिए हम घमंड नहीं कर सकते। यीशु मसीह को स्वीकार करने का अर्थ है - यह मानना कि यीशु मसीह परमेश्वर के पुत्र हैं, जिसका वह दावा करते हैं, और फिर उन्हें अपने जीवन में आमंत्रित करना, ताकि वे हमारे जीवन का मार्गदर्शन और निदेश करें।12 यीशु ने कहा, “मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।”13 और यह है यीशु मसीह का निमंत्रण- उन्होंने कहा, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ जाऊँगा।”14 आप परमेश्वर के निमंत्रण पर कैसी प्रतिक्रिया करेंगे (क्या जवाब देंगे)? इन दो वृत पर विचार कीजिए : स्वयं द्वारा निर्देशित जीवन ‘स्वयं’ सिंहासन पर विराजमान है। यीशु जीवन से बाहर हैं। निर्णय तथा कार्य सिर्फ स्वयं द्वारा, जिसका परिणाम कुंठा या निराशा है। यीशु मसीह द्वारा निर्देशित जीवन यीशु जीवन और सिंहासन पर विराजमान हैं। ‘स्वयं’ यीशु को मानने वाला/समर्पित यह व्यक्ति यीशु के प्रभाव और निर्देशन को अपने जीवन में देखता है। कौन सा वृत आपके जीवन का प्रतिनिधित्व करता है? कौन से वृत से आप अपने जीवन का प्रतिनिधित्व करवाना चाहेंगे ? यीशु मसीह के साथ एक रिश्ता शुरू कीजिए… आप यीशु को, इसी क्षण, अपने जीवन में ग्रहण कर सकते हैं। याद रखें कि यीशु ने कहा, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ जाऊँगा।”15 क्या आप इस निमंत्रण पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करना चाहेंगे? देखिए कैसे… परमेश्वर आपके हृदय के इरादे में, ना की आपके सही या सूक्ष्म शब्दों में रूचि रखता है। अगर आप अनिश्चित हैं कि क्या प्रार्थना करनी है, तो यह आपको इन्हें शब्दों में डालने में मदद कर सकता है: “यीशु, मैं आपको जानना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे जीवन में आएँ। मेरे पापों के लिए सूली पर मरने के लिए, ताकि मैं पूरी तरह आपके द्वारा स्वीकार किया जा सकूँ, धन्यवाद। केवल आप ही मुझे वह समर्थ दे सकते हैं जिस से मैं अपने आप को बदलकर वैसा मनुष्य बन सकूँ जैसा आप मुझे बनाना चाहते हैं। मुझे क्षमा करने और अनंत जीवन देने के लिए आपका धन्यवाद। मैं अपना जीवन आपको समर्पित करता हूँ। आप उसके साथ जैसा चाहें वैसा करें। आमीन।” अगर आपने सच्चाई से/पूरे दिल से यीशु को इसी क्षण अपने जीवन में आने को कहा है, तो, जैसा कि उन्होंने वादा किया है, वे आपके जीवन में आ गए हैं। आपने परमेश्वर के साथ एक व्यक्तिगत रिश्ता शुरू कर दिया है। ► मैंने अभी यीशु को अपने जीवन में आने को कहा है ( कुछ मददगार सूचना आगे है )… ► मैं यीशु को अपने जीवन में आने के लिए कहना चाहूँगा, पर मेरा एक प्रश्न है जिसका मैं पहले उत्तर चाहती हूँ … पाद टिप्पणी: (1) यूहन्ना 3:16 (2) यशायाह 53:6 (3) रोमियो 6:23 (4) तीतुस 3:5 (5) यूहन्ना 3:16 (6) कुलुस्सियों 1:15,16 (7) 1 कुरिन्थियों 15:3-6 (8) यूहन्ना 14:6 (9) यूहन्ना 7:37,38 (10) यूहन्ना 1:12 (11) इफिसियो 2:8,9 (12) यूहन्ना 3:1-8 (13) यूहन्ना 10:10 (14) प्रकाशित वाक्य 3:20 (15) प्रकाशित वाक्य 3:20 परमेश्वर के वचन को स्वयं पढ़ें

  यशु मसीह करें खोजें


परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानना

परमेश्वर को जानने के लिए क्या करना पड़ेगा? निम्नलिखित यह बताएगा कि आप व्यक्तिगत रूप से किस प्रकार, इसी क्षण, परमेश्वर के साथ एक रिश्ता आरम्भ कर सकते हैं।


परमेश्वर के साथ रिश्ता बनाने के लिए क्या करना पड़ता है? बिजली के गिरने का इंतजार? या अपने आप को निःस्वार्थ भाव से धार्मिक कार्यों में लगा लेना? या फिर, एक बेहतर मनुष्य बनना, ताकि परमेश्वर आपको स्वीकार कर ले? नहीं, इनमें से कुछ भी नहीं! परमेश्वर ने बाइबल में यह बहुत स्पष्ट तरीक़े से बताया है कि हम उसे कैसे जान सकते हैं? यह लेख आपको बताएगा कि आप किस प्रकार, इसी क्षण, व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के साथ एक रिश्ता आरम्भ कर सकते हैं।…



सिद्धान्त एक: परमेश्वर आपसे प्रेम करता है और आपके जीवन के लिए उसकी एक अद्भुत योजना है।

बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

परमेश्वर ने आपको बनाया है। केवल यही नहीं, वह आपसे बहुत प्रेम करता है और चाहता है कि आप उसे अभी से जानें और उसके साथ एक अनंत जीवन बिताएँ। यीशु मसीह ने कहा, “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”1

यीशु मसीह इसलिए आए ताकि हममें से हर एक जन व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर को जान और समझ सके। केवल यीशु ही जीवन में अर्थ और उद्देश्य दे सकते हैं।

तो, परमेश्वर को जानने से हमें क्या दूर रखता है?...



सिद्धान्त दो: हम सब पाप करते हैं, और हमारे पापों ने ही हमें परमेश्वर से अलग किया है।

हम उस अलगाव को, जो कि हमें परमेश्वर से दूर करता है, अपने पापों की वजह से महसूस करते हैं। बाइबल हमें बताती है, “हम तो सब के सब भेड़ों की तरह भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग ले लिया।”2

हमारे दिल की गहराई में, परमेश्वर और उसके तरीकों के प्रति हमारा रवैया शायद एक सक्रिय विद्रोह या फिर एक निष्क्रिय उदासीनता की तरह है। लेकिन ये सब उसी का प्रमाण है जिसे बाइबल पाप कहती है।

हमारे जीवन में पाप का परिणाम मृत्यु है -- यानी के, परमेश्वर से आत्मिक अलगाव।3 हालांकि हम अपने प्रयत्न से परमेश्वर के करीब जाने की कोशिश तो करते हैं, पर हम अनिवार्य रूप से असफल होते हैं।

परमेश्वर और हमारे बीच एक बहुत बड़ा फासला है। इस चित्र में तीरों के चिह्न यह दर्शाते हैं कि हम किस तरह से अपने प्रयत्नों/प्रयास से परमेश्वर तक पहुँचना चाहते हैं…दूसरों के प्रति अच्छे काम कर के, धार्मिक रसम रिवाज कर के, अच्छा मनुष्य बनने का प्रयास करके, इत्यादि। पर समस्या यह है कि हमारे हर अच्छे से अच्छे प्रयास भी हमारे पापों को छिपाने में, या उन्हें मिटाने में अपर्याप्त होते हैं।

परमेश्वर हमारे पाप को जनता है, और यह पाप एक बाधा के समान उनके और हमारे बीच में खड़ा हो जाता है। और, बाइबल कहती है की पाप की सज़ा मृत्यु है जिसकी वजह से हम अनंतकाल के लिए परमेश्वर से अलग हो जाते…

...सिवाय इसके कि परमेश्वर ने हमारे लिए कुछ किया।

तो, हम किस प्रकार परमेश्वर के साथ रिश्ता बना सकते हैं? ...




सिद्धान्त तीन: हमारे पापों को धोने का एकमात्र तरीका जो परमेश्वर ने हमें दिया है, वह यीशु मसीह है। केवल उनके द्वारा हम परमेश्वर के प्रेम को, और हमारे जीवन के लिए जो उनकी योजना है, उसको जान और अनुभव कर सकते हैं।

यीशु मसीह ने हमारे सारे पाप अपने ऊपर ले लिए--यह जानते हुए की हमने कितना पाप किया है, और कितना पाप और आगे करेंगे--और उन्होंने हमारे सारे पापों का भुगतान सलीब पर चढ़ कर, अपनी जान हमारे लिए देकर, चुका दिया। वह हमारी जगह पर मरे, और उन्होंने यह इसलिए किया, क्योंकि वह हमसे बहुत प्रेम करते हैं।

“…तो उस ने हमारा उद्धार किया, और यह हमारे धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने किए, पर उसकी दया/अनुग्रह के द्वारा है।”4

“क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”5

यीशु, “अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है…सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।”6

यीशु मसीह हमारे पापों के लिये केवल मरे नहीं, परंतु तीसरे दिन जी भी उठे।7 जब उन्होंने ऐसा किया, उन्होंने निःसंदेह यह सिद्ध कर दिया कि वे जायज़ रूप/पूरे हक़ से, अनंत जीवन का वादा कर सकते हैं – और कि वे ‘परमेश्वर के पुत्र’ हैं तथा परमेश्वर को जानने का एकमात्र रास्ता हैं। इसलिए यीशु ने कहा “मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।”8

परमेश्वर तक पहुँचने का कठिन प्रयास करने के बजाय, वह हमें यह बताते हैं कि हम कैसे, इसी क्षण, उनके साथ एक रिश्ता कायम कर सकते हैं। यीशु पुकार कर कहते हैं, “मेरे पास आओ।” “यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए। जो मुझ पर विश्वास करेगा…उसके ह्रदय में से जीवन के जल की नदियां बह निकलेंगी।”9 यह यीशु मसीह का हमारे प्रति प्रेम ही था जिस कारण उन्होंने सूली/सलीब को सहा। और अब वह हमें अपने पास आने का निमंत्रण देते हैं, ताकि हम परमेश्वर के साथ एक व्यक्तिगत रिश्ता बना सकें।

केवल यह जानना कि यीशु मसीह ने हमारे लिए क्या किया और वे हमें क्या दे रहे हैं, पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर के साथ एक रिश्ता बनाने के लिए हमें उनको अपने जीवन में स्वागत करना होगा…



सिद्धान्त चार: हमें व्यक्तिगत रूप से यीशु मसीह को अपने प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना होगा।

बाइबल कहती है, “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।10

हम यीशु को विश्वास के द्वारा स्वीकार करते हैं। बाइबल कहती है, “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है और न कर्मों के कारण; ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”11 उद्धार, हमारे अच्छे कर्मों का इनाम या नतीजा नहीं है, इसलिए हम घमंड नहीं कर सकते।

यीशु मसीह को स्वीकार करने का अर्थ है - यह मानना कि यीशु मसीह परमेश्वर के पुत्र हैं, जिसका वह दावा करते हैं, और फिर उन्हें अपने जीवन में आमंत्रित करना, ताकि वे हमारे जीवन का मार्गदर्शन और निदेश करें।12 यीशु ने कहा, “मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।”13

और यह है यीशु मसीह का निमंत्रण- उन्होंने कहा, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ जाऊँगा।”14

आप परमेश्वर के निमंत्रण पर कैसी प्रतिक्रिया करेंगे (क्या जवाब देंगे)?

इन दो वृत पर विचार कीजिए :


स्वयं द्वारा निर्देशित जीवन

 ‘स्वयं’ सिंहासन पर विराजमान है।

 यीशु जीवन से बाहर हैं।

 निर्णय तथा कार्य सिर्फ स्वयं द्वारा, जिसका परिणाम कुंठा या निराशा है।



यीशु मसीह द्वारा निर्देशित जीवन

 यीशु जीवन और सिंहासन पर विराजमान हैं।

 ‘स्वयं’ यीशु को मानने वाला/समर्पित

 यह व्यक्ति यीशु के प्रभाव और निर्देशन को अपने जीवन में देखता है।


कौन सा वृत आपके जीवन का प्रतिनिधित्व करता है?

कौन से वृत से आप अपने जीवन का प्रतिनिधित्व करवाना चाहेंगे ?

यीशु मसीह के साथ एक रिश्ता शुरू कीजिए…



आप यीशु को, इसी क्षण, अपने जीवन में ग्रहण कर सकते हैं। याद रखें कि यीशु ने कहा, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ जाऊँगा।”15 क्या आप इस निमंत्रण पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करना चाहेंगे? देखिए कैसे…

परमेश्वर आपके हृदय के इरादे में, ना की आपके सही या सूक्ष्म शब्दों में रूचि रखता है। अगर आप अनिश्चित हैं कि क्या प्रार्थना करनी है, तो यह आपको इन्हें शब्दों में डालने में मदद कर सकता है:

“यीशु, मैं आपको जानना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे जीवन में आएँ। मेरे पापों के लिए सूली पर मरने के लिए, ताकि मैं पूरी तरह आपके द्वारा स्वीकार किया जा सकूँ, धन्यवाद। केवल आप ही मुझे वह समर्थ दे सकते हैं जिस से मैं अपने आप को बदलकर वैसा मनुष्य बन सकूँ जैसा आप मुझे बनाना चाहते हैं। मुझे क्षमा करने और अनंत जीवन देने के लिए आपका धन्यवाद। मैं अपना जीवन आपको समर्पित करता हूँ। आप उसके साथ जैसा चाहें वैसा करें। आमीन।”

अगर आपने सच्चाई से/पूरे दिल से यीशु को इसी क्षण अपने जीवन में आने को कहा है, तो, जैसा कि उन्होंने वादा किया है, वे आपके जीवन में आ गए हैं। आपने परमेश्वर के साथ एक व्यक्तिगत रिश्ता शुरू कर दिया है।

 मैंने अभी यीशु को अपने जीवन में आने को कहा है ( कुछ मददगार सूचना आगे है )…
 मैं यीशु को अपने जीवन में आने के लिए कहना चाहूँगा, पर मेरा एक प्रश्न है जिसका मैं पहले उत्तर चाहती हूँ …

����जय श्री गणेश जी����

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पाद टिप्पणी: (1) यूहन्ना 3:16 (2) यशायाह 53:6 (3) रोमियो 6:23 (4) तीतुस 3:5 (5) यूहन्ना 3:16 (6) कुलुस्सियों 1:15,16 (7) 1 कुरिन्थियों 15:3-6 (8) यूहन्ना 14:6 (9) यूहन्ना 7:37,38 (10) यूहन्ना 1:12 (11) इफिसियो 2:8,9 (12) यूहन्ना 3:1-8 (13) यूहन्ना 10:10 (14) प्रकाशित वाक्य 3:20 (15) प्रकाशित वाक्य 3:20

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जीवन से संबंधित प्रश्नजीवन इतना कठिन क्यों है? By वनिता कासनियां पंजाब “क्यों?” जब जीवन कठिन हो, तब शांति पाने का क्या कोई रास्ता है?जो कुछ हम इस दुनिया में देखते उसे कैसे समझते हैं? आतंकवादी हमले, सेक्स गुलामी, नस्लवाद, दुनिया में भूख से मरते हुए लोग?अवचेतन रूप से, बहुत बार शायद हम अपने आप से प्रश्न पूछते हैं। पर चेतन अवस्था में शायद ही कभी। हम अपना जीवन जीने में इतने व्यस्त रहते हैं कि शायद ही कभी रुकते हैं और हैरान होते हैं कि ऎसा क्यों होता है?पर कभी ऐसा कुछ हो जाता है जिससे हम जाग जाते हैं। हमारे माता-पिता का तलाक हो जाता है, पास के मुहल्ले में रहनेवाली लड़की का कोई अपहरण कर लेता है, या किसी संबंधी को कैंसर हो जाता है। ऐसा होना कुछ समय के लिए हमें जगा देता है। पर बहुत बार हम फिर से अस्वीकृति में डूब जाते हैं। तब तक, जब तक कि किसी दूसरी त्रासदी का सामना नहीं होता। फिर हम सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं, कि यहाँ कुछ सही नहीं है। कुछ ऐसा है जो बिल्कुल गलत है। जीवन को इस तरह का नहीं होना चाहिए!तो, बुरी चीजें ‘क्यों’ होती हैं?यह संसार एक बेहतर जगह क्यों नहीं है?क्यों? इस प्रशन का बाइबल में एक उत्तर पाया जाता है। पर यह वैसा उत्तर नहीं है जो अधिकतर मनुष्य सुनना चाहेंगे: संसार जैसा है वैसा इसलिए है क्योंकि, एक तरह से, ऐसा संसार हमने माँगा है।सुनने में अजीब लगता है?क्या, या कौन इस संसार को बदल सकता है? क्या, या कौन इस बात की गारंटी दे सकता है कि जीवन दुखों से मुक्त होगा, सबके लिए, सब समय?परमेश्वर कर सकता है। परमेश्वर उसे पूरा कर सकता है। पर वह वैसा नहीं करता है। कम से कम इस समय तो नहीं। और परिणामस्वरूप, हम उस से नाराज हैं। हम कहते हैं, “परमेश्वर सशक्त और सभी को प्रेम करनेवाला नहीं हो सकता। अगर वह वैसा होता, तो यह संसार जिस तरह से है, वैसा नहीं होता!”हम ऐसा इस आशा से कहते हैं, कि शायद इस विषय में परमेश्वर अपनी स्थिति बदल दे। हम यह आशा करते हैं कि यदि हम उस को अपराधबोध करेंगे, तो शायद वह जिस तरह काम करता आया है, उसमें बदलाव लाएगा।पर ऐसा लगता है वह अपने ठान से हिलना नहीं चाहता। वह ऐसा क्यों नहीं करता है?परमेश्वर अपने ठान से नहीं हिलता – वह इसी समय चीजों को परिवर्तित नहीं करता है – क्योंकि जो हमने उससे माँगा है, वह हमें वह दे रहा है: एक ऐसा संसार जहाँ हम उसके साथ ऐसा व्यवहार करते है जैसे वह अनुपस्थित और अनावश्यक हो।क्या आपको आदम और हव्वा की कहानी याद है? उन्होंने, “मना किया हुआ फल” खाया था। वह फल एक ‘विचार’ था कि परमेश्वर ने जो उन्हें कहा या जो उन्हें दिया है, उसे वे अनसुना और अनदेखा कर सकते हैं। आदम और हव्वा ने एक तरह से आशा की कि वे बिना परमेश्वर के, परमेश्वर की तरह बन जाएँगे।उन्होंने इस विचार को महत्व दिया कि परमेश्वर के अस्तित्व के अलावा, और उसके साथ एक व्यक्तिगत सम्बंध बनाने से ज़्यादा, कुछ और है जो कि ज्यादा कीमती है। और, इस संसार की प्रणाली--अपनी सभी गलतियों के साथ--उनके इस चुनाव के फलस्वरूप बनी।एक तरह से उनकी कहानी हम सबकी कहानी है। है ना? हम में से कौन है जिसने ये बात कभी नहीं कही है- अगर ऊँचे स्वर में नहीं, कम से कम अपने मन में ही सही- “परमेश्वर मैं सोचता हूँ कि यह काम मैं आपके बिना कर सकता हूँ। मैं अकेले ही यह कर लूंगा। पर प्रस्ताव देने के लिए धन्यवाद।”हम सबने, बिना परमेश्वर के, जीवन को सुचारू रूप से चलाने की कोशिश की है।हम ऐसा क्यों करते हैं? शायद इसलिए क्योंकि हमने इस धारणा को अपना लिया है कि कुछ और चीज़ मूल्यवान, और ज़्यादा महत्वपूर्ण है - परमेश्वर से भी ज्यादा। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग चीजें हैं, पर मानसिकता सबकी एक जैसी ही है: कि, परमेश्वर जीवन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। असल में, मैं बस उनके बिना इसे पूरी तरह से कर लेता हूँ।इस पर परमेश्वर की क्या प्रतिक्रिया है?परमेश्वर हमें यह करने देता है! बहुत से लोगों को इसके दुखद फल का अनुभव होता है, दूसरों के या फिर उनके स्वयं के चुनाव के कारण, जो कि परमेश्वर के तरीके के विपरीत चलता है…हत्या, यौन शोषण, लालच, झूठ, धोखा, बदनामी, व्यभिचार, अपहरण आदि।इन सब बातों को वे लोग समझा सकते हैं, जिन्होंने परमेश्वर को अपने जीवन में आने नहीं दिया, और अपने जीवन को उससे प्रभावित नहीं होने दिया। ये लोग अपने जीवन को उसी तरह से व्यतीत करते हैं जिस तरह वे सोचते हैं कि सही है, जिस कारण वे और दूसरे लोग दुखित रहते हैं।इन सब पर परमेश्वर का क्या दृष्टिकोण है?वह आत्मसंतुष्ट (अपने में ही प्रसन्न) नहीं है। वास्तव में, परमेश्वर को सही तरीके से उसके व्यवहार द्वारा जाना जा सकता है - परमेश्वर का आगे की ओर झुकाव, उसकी करूणा, उसकी यह आशा कि हम उसकी ओर मुड़ें ताकि वह हमें वास्तविक जीवन दे सके।यीशु ने कहा, “हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।”1 पर सभी उसके साथ चलने के इच्छुक नहीं थे। य़ीशु ने उसपर टिप्पणी करते हुए यह कहा, “हे यरूशलेम, हे यरूशलेम; तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा।”2एक बार फिर यीशु उसके साथ हमारे रिश्ते के विषय को वापस लाते हैं, “जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।”3पर, तब क्या जब जीवन ही अनुचित हो, जब बुरी चीज़ें हमारे जीवन में होती हैं?उन भयंकर परिस्थितियों का क्या करें जिनकी मार हमारे जीवन में पड़ती है, जिनका कारण हम नहीं बल्कि कोई और है। जब हमें ऐसा लगता है कि हम सताए गए हैं, तब यह एहसास करना लाभप्रद है कि स्वयं परमेश्वर ने दूसरों का बुरा व्यवहार सहा है। आप जो अनुभव कर रहे हैं, परमेश्वर पूरा समझते हैं।हमारे लिए यीशु ने जो सहा, उससे अधिक दर्दनाक जीवन में कुछ नहीं है- उनके मित्रों ने उनका साथ छोड़ दिया, जो उनपर विश्वास नहीं करते थे उन्होंने उनका उपहास किया, सूली पर चढ़ाए जाने से पहले उन्हें मारा गया और सताया गया, क्रूस पर कीलें ठोक कर उन्हें लटकाया गया, शर्मनाक सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया और धीरे-धीरे, दम घुटने से उनकी मृत्यु हो गई।उन्होंने हमारी रचना की, फिर भी मानव जाति को अपने ऊपर अत्याचार करने की छूट दी, ताकि पवित्र शास्त्र में जो लिखा है वह पूरा हो सके, और हमें अपने पापों से मुक्ति मिल सके। यीशु के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। उन्हें पता था कि क्या होनेवाला है- पूरी बातों का, पूरे दर्द का, पूरी प्रतारणा का, उन्हें विस्तार से पूर्वज्ञान था।“यीशु यरूशलेम को जाते हुए बारह चेलों को एकान्त में ले गया, और मार्ग में उन से कहने लगा, “देखो, हम यरूशलेम को जाते हैं; और मनुष्य का पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा और वे उस को घात के योग्यहाथ पकड़वाया जाएगा और वे उस को घात के योग्य ठहराएंगे। और उस को अन्यजातियों के हाथ सोंपेंगे, कि वे उसे ठट्ठों में उड़ाएं, और कोड़े मारें, और क्रूस पर चढ़ाएं, और वह तीसरे दिन जिलाया जाएगा॥”4कल्पना कीजिए कि आपको पता है कि आपके साथ कुछ भयानक होनेवाला है। यीशु संवेगात्मक और मनोवैज्ञानिक पीड़ा को समझते हैं। जिस रात को यीशु को पता था कि उन्हें कैद कर लिया जाएगा, वह प्रार्थना के लिए गए, पर अपने साथ अपने कुछ मित्रों को ले गए।“और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा। तब उस ने उन से कहा, “मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला जा रहा है। तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो” फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, “हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।”5हालांकि यीशु ने अपने तीन मित्रों को यह बताया, वे यीशु की पीड़ा को गहराई से समझ नहीं पाए, और जब यीशु प्रर्थना के बाद वापस आए तो उन्होंने देखा कि वे तीनों सो रहे थे। यीशु यह जनता है कि दुख/पीड़ा और अत्यंत उदासी से अकेले गुजरना क्या होता है।यहाँ ये संक्षिप्त रूप में दिया गया है, जैसे यूहन्ना ने (बाइबल में) सुसमाचार में लिखा है, “वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहिचाना। वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया। परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।”6 “परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”7इस में कोई सवाल या संदेह नहीं है कि इस संसार में अत्यंत दुख और तीव्र पीड़ा है।इनमें से कुछ का विवरण दूसरों की ओर से स्वार्थीपन, और घृणित कार्यों द्वारा समझाया जा सकता है। पर कई दुखों/और पीड़ाओं को इस जीवन में समझाया भी नहीं जा सकता। पर उसके लिए परमेश्वर स्वयं को हमारे लिए प्रस्तुत करते हैं। परमेश्वर हमें यह ज्ञान देते हैं कि उन्होंने भी दुख सहा है, और उन्हें हमारे दर्द और जरूरतों का एहसास है। यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “तुम्हारे लिए मैं शान्ति छोड़े जाता हूँ; मैं तुम्हें अपनी शान्ति दे रहा हूँ; वैसी नहीं, जैसी संसार देता है। अपने मन को व्याकुल और भयभीत न होने दो।”8भयभीत और परेशान होने के लिए प्रचुर कारण है, पर परमेश्वर हमें अपनी शांति देता है, जो कि हमारी समस्या या परेशानी से अधिक बड़ी है। वह आखिरकार, परमेश्वर, हमारा रचयिता है। वह जो हमेशा से अस्तित्व में है। वह जिसने इस ब्रह्मांड की आसानी से रचना की।इतना शक्तिमान होते हुए भी, वह हम सब को घनिष्टता से जानता है, यहां तक कि हमारे सबसे छोटे, महत्वहीन विवरणों को भी। और यदि हम अपने जीवन के लिए उस पर भरोसा करें, उस पर निर्भर रहें, चाहे हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़े, वह हमें सुरक्षित रखेगा।यीशु ने कहा, “मैंने तुमसे ये सब इसलिए कहा है कि तुम्हें मुझमें शान्ति प्राप्त हो. संसार में तुम्हारे लिए क्लेश ही क्लेश है किन्तु आनन्दित हो कि मैंने संसार पर विजय प्राप्त की है।”9 वह हमारे लिए खतरे की चरम सीमा तक गया -- मृत्यु -- और उसपर विजय पाई। यदि हम उसपर विश्वास करेंगे, तो वह हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों के पार ले जाएगा, और फिर हमें अनंत जीवन में लाएगा।हम अपने जीवन में या तो परमेश्वर के साथ चल सकते हैं या उसके बिना चल सकते हैं।यीशु ने प्रार्थना की, “हे धार्मिक पिता, संसार ने मुझे नहीं जाना, परन्तु मैं ने तुझे जाना और इन्होंने भी जाना कि तू ही ने मुझे भेजा। और मैं ने तेरा नाम उन को बताया और बताता रहूंगा कि जो प्रेम तुझ को मुझ से था वह उन में रहे, और मैं उनमें रहूं॥”10आप अपने आप से यह प्रशन पूछते हुए दिखाई दे सकते हैं, “जीवन इतना कठिन क्यों है?” परमेश्वर के बिना, मानवता आसानी से, नफरत, नस्लवाद, यौन दुर्व्यवहार, एक-दूसरे की हत्या, जैसी चीज़ों में खींची चली जाती है।यीशु ने कहा, “मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत का जीवन पाएँ।”11 यह जानने के लिए कि परमेश्वर के साथ एक रिश्ते की शुरुआत कैसे करें, कृपया देखिए:

जीवन से संबंधित प्रश्न जीवन इतना कठिन क्यों है?  By  वनिता कासनियां पंजाब “क्यों?” जब जीवन कठिन हो, तब शांति पाने का क्या कोई रास्ता है? जो कुछ हम इस दुनिया में देखते उसे कैसे समझते हैं? आतंकवादी हमले, सेक्स गुलामी, नस्लवाद, दुनिया में भूख से मरते हुए लोग? अवचेतन रूप से, बहुत बार शायद हम अपने आप से प्रश्न पूछते हैं। पर चेतन अवस्था में शायद ही कभी। हम अपना जीवन जीने में इतने व्यस्त रहते हैं कि शायद ही कभी रुकते हैं और हैरान होते हैं कि ऎसा क्यों होता है? पर कभी ऐसा कुछ हो जाता है जिससे हम जाग जाते हैं। हमारे माता-पिता का तलाक हो जाता है, पास के मुहल्ले में रहनेवाली लड़की का कोई अपहरण कर लेता है, या किसी संबंधी को कैंसर हो जाता है। ऐसा होना कुछ समय के लिए हमें जगा देता है। पर बहुत बार हम फिर से अस्वीकृति में डूब जाते हैं। तब तक, जब तक कि किसी दूसरी त्रासदी का सामना नहीं होता। फिर हम सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं,  कि यहाँ कुछ सही नहीं है। कुछ ऐसा है जो बिल्कुल गलत है। जीवन को इस तरह का नहीं होना चाहिए! तो, बुरी चीजें ‘क्यों’ होती हैं? यह संसार एक बेहतर जगह क्यों नहीं है? क...